दानुष भाग 1 अंधेरे की बेटी

2019 में बरेली शहर के हाईवे पर कहीं रात के पौने 12 बजे। हाईवे पर सन्नाटा और बीच बीच में भारी गाड़ियों के टायरों का, रोड को कुचलते हुए जाने का शोर। इस बीच अंधेरे में दो लोग रोड किनारे खड़े आपस में बात कर रहें है। " पौने 12 तो हो गया कोई आया नहीं" पहले आदमी ने दूसरे से कहा। "ये पौने 12 का क्या हिसाब है सीधे सीधे 12 बजे क्यों नहीं बुलाता वो" दूसरे ने अंधेरे में, अपनी बंदूक की नली के निशाने से दूर हाईवे की ओर देखा, तो सामने से जीप चली आ रही थी। जीप दोनों लोगों के सामने आकर रुकती है। यहां एक सौदा होने वाला था। गाड़ी में बैठे लोग नकाबपोश थे। वो वहां पर मौजूद दो बंदो से कुछ सामान लेने आए थे।

एक नकाबपोश, " सामान दिखाओ" हाईवे वाले दोनों बंदे एक संदूक खोल कर दिखाते है जिसमें एक लड़की बेहोश पड़ी थी। दूसरा नकाबपोश अपने साथियों से पूछता है क्या ये वही है ? जवाब में हाईवे वाला बंदा बोलता है," हैं ये वही है हमें हमारा पैसा दो और और अपना सामान लेके निकलो यहां से"। 

तीन नकाबपोश जिनमें से एक अभी तक खामोश था अपना मुखौटा हटाता है। उसकी आंखे शांत थी और चेहरा मुस्कुराता हुआ। वो बोला, " निकलो !!! ये भाषा और इसमें भरा ये गरूर केवल एक बंदूक के सहारे ? लेकिन इसमें तुम्हारा क्या कसूर। तुम्हारे लिए तो ये बंदूक ही सांस बड़ी ताकत होगी। है के नही?"

"मैं तुम्हे यहां से जाने देता अगर तुम अपनी ये बंदूक थोड़ी नीचे रखते, और थोड़ा सा मुस्कुराकर बात करते, तो में तुम्हे, पैसे भी दे देता। पर अब जबकि तुम अपना हर मौका गवा चुके हो..." 

उसको बीच में रोककर हाईवे वाले बंदे ने कहा के ,"तुम बहुत बकवास कर रहे हो। क्यों ना हम तुम्हे मारकर वो सूटकेस अपनी गाड़ी में रखे और पैसे लेकर यहां से निकाल जाएं और बाकी की खबर कल के अखबार में पड़ लें। " 

 चारो तरफ सन्नाटा था और दूर से बड़ी बड़ी गाड़ियों की गुजरने की आवाज़ें आ रही थीं। वो मुस्कुराया और उसने अपना नाम बताया , " दनुश नाम है मेरा लेकिन (जेब से अखबार निकलते हुए ) कल के अखबार में मेरा नाम नहीं है।(अखबार देते हुए) इसमें तुम दोनों का नाम है। वो दोनो बंदे अखबार में अपनी मरी हुई तस्वीर देखते हैं और अखबार की तारीख देखते हैं तो उसने लिखा होता है 24 जून 2019। ये देखकर दोनो घबरा जाते है लेकिन जुर्म की दुनिया में घबराहट दिखाई नहीं जाती। वो कहते हैं," इतना है लेवल का मैटर क्यों बना रहे हो भाई हमने तुम्हारा काम किया है। हमें पैसा दो और जाने दो। " 
बंदूक तनी रही और दनुष मुस्कुराहट और भी बढ़ती चली गई और उसने अपने सामने लगी बंदूक की तिनका भर भी चिंता किए बिना कहा ," क्या तुमने टाइम देखा? 12 बज चुके हैं। " और जब तक किसी को कुछ समझ आता संदूक जिसमें बंधी हुई लड़की थी, अचानक हिलने लगा। जैसे के उसके अंदर कोई बावला भेड़िया बंद हो। हाईवे वाले दोनों बंदे डर गए। 

 दानुश ने ऊंची आवाज़ में कहना शुरू किया, " महरीमी मेरी बेटी। आ जाओ अपने पापा के पास। अब समय आ चुका है मेरी बेटी । उठो ज़मीन की गहराई से। में तुम्हरे लिए इस दुनिया के दरवाज़  खोलता हूं। "

इतना कहते ही संदूक खुलता है और उसमें से वो लड़की उठ खड़ी होती है। वाह कुछ देर हाईवे वाले दोनों बन्दों को देखती है। महारीमी के डरावने रूप को देख कर दोनों बंदे डर जाते हैं और भागने लगते हैं। महरिमी अपने दोनो हाथ हवा में उठते हुए दोनो कलाइयों को घूमती है और ऐसा करने से दोनों हाईवे वाले बन्दों की गर्दन टूट जाती हैं। उनके जिस्म से जुड़ा उनका दिमाग अब अलग हो चुका था और उनका शरीर तड़पते हुए ज़मीन पे टपक जाता है। 

रात के 12बजे जब पूरा बरेली सोया हुआ था हाईवे पर केवल गाडिया ही नहीं जगी हुई थी। वहां सदियों बाद एक अंधेरी ताकत जाग चुकी थी। जिनके साए बड़ी गाड़ियों की रोशनी पड़ने पर भी अंधेरे जैसे ही नजर आ रहे थे। 

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