ऑनलाइन दोस्ती

कुछ दिन से फेसबुक पर नफरत देख रहा हूं। ट्विटर नहीं इस्तेमाल करता। इंस्टाग्राम हाल ही में चला कर देखा। किसी को फॉलो करने या करवाने की होड़ सी मची है। लोग जल्दी बुरा मान जाते हैं। उन्हें लगता है के उनकी बेज्जती हो गयी। आप लिखेंगे के, "में तुम्हे अच्छा ही समझता हूं।" वो पढ़ेंगे "में तुम्हे अच्छा नहीं समझता हूं। "
लोग अलग अलग तरीक़ों के स्टेटस डालते हैं। जिन्हें उजाले में बने रहना है वो हर समय चिपके मिलेंगे। कहानियां होती है। बे सर पैर वाली। इशारे होते हैं के शर्लाक की भांति आपको ढूंढने पड़ेंगे। स्टेटस की गरिमा उसके लिखने वाले से तय होती है। अगर बुद्धा का कहा गया कोई एक ही प्रवचन दो अलग लोग डालें तो, लोगों के व्यक्तित्व के हिसाब से उन्हें देखा जायेगा।
मेने देखा की फेसबुक पर जो व्यक्तित्व का कास्ट्यूम पहन कर घूमते हैं लोग। असल जिंदगी में वो उसके उलट हो जाते हैं। फेसबुक पर आँखे दिखा कर घुन्नने वाले असल जिंदगी में निहायत ही मोम मिलेंगे। ही लिखा है 'नही' नही।
में उस दिन के इंतज़ार में हूँ जिस दिन ये सब ढकोसले बंद हो जायेंगे।लोग अपने बारे में बताने खुद आएंगे। किसी को क्या अच्छा लगा है और क्या बुरा इसका अंदाज़ा लगाना बेकार है। आप खुद ही पहल करे और सच में जाकर बात करके पता करें के मित्र क्या चाहता है। सच में गले लगे और सच में किसी के विचार व्यक्तित्व को पसंद करे या नापसंद भी। सच में रोएं और हसे। सच में।

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