घोड़ानाथ
वो उस आदमी से ऐसे मिला मानो उसके होश ही उडा दिए हो। वो बस आदमी से आदमी तक जाता और उन्हें शांत कर देता था।
किसी वजह से वो मीडिया से बचता था। पता नही क्यों। मेने कभी पुछा नहीं। मेने देखा के वो हस्ता बहुत था। हस्ते हस्ते मय्यत में भी हो आता था। कई बार लोग उसको गलत समझते थे। लेकिन वो कभी बुरा नहीं मानता था।
हम सुबे सुबे दिल्ली में इंडिया गेट गए थे। वो कहीं से आया था। आते ही अचानक उसने कहा लेट जाओ। मेने पूंछा क्यों तब तक उसने मुझे नीचे धकेल दिया। मैं पट्ट ज़मीन पर गिरा और मेरे पीछे एक धमाका सा हुआ। मेरे कान सन्ना गये।कोई बोला भागो भागो भागो और बस भाग पड़ा। दो कदम भागने के बाद में एक बड़े पत्थर से टकरा कर गिर गया। मेने रेंगते हुए पत्थर की ओट ली । सामने कुछ लोग अँधा धुंध गोलियां चल रही थे। सब इधर उधर भाग रहे थे। में वहीँ हौज की तली में घुस के छुप गया।
मैंने झांक कर देखा के वो बस उस बन्दूक पकडे आदमी से कुछ कहता और उसे शांति से भगा देता। एक फिर दोसरा और तीसरा आदमी उसने बस कुछ कह कर इतने मजबूर कर दिए के वो बन्दूक फेक कर घबराते हुए भाग खड़े हुए। में हैरान था। अजीब करिश्मा सा मेरे सामने हो रहा था।
वो बस चलता रहा। सीधे विधान सभा की ओर। कुछ पुलिस वाले हताश से लोगो को दूर भगा रहे थे। गाड़ियों का जाम लग चुका था और लूग गाड़ियां छोड़ कर भाग रहे थे। इंडिया गेट के सामने धुंआ था और चीथड़े थे। मेने देखा के को चलते चलते पुलिस के एक दस्ते की तरफ पंहुचा। वो एक बम को घेरे खड़े थे। उस आई ने उनसे भी कुछ कहा और वो भागे। उनके भागते ही वो उस बम ओर लेट गया और लेटते ही उसके चीथड़े उड़ गए। मेरे सामने वो गायब हो गया। पल भर में।
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