उठा कलम दहाड़ कर
उठा कलम दहाड़ कर
छोटा था जब में
स्कूल में
देखा था मैंने
Normal
खुद से ही खुद की
तारीफें
करनी थी खुद से
दरबदर
मेरा t था टेड़ा भेड़ा क्यों
क्यों R में था र खड़ा
कैसे जोड़ते घटाते हैं
मुझे नहीं समझ पड़ा
होना है कभी normal और कभ होना है formal
मुझे नहीं समझ पड़ा
मेरा तो जीरो ही था O
और जीरो ही था नाश्ता
जीरो ही रात चाँद था
जीरो ही था वो बादशाह
जो एक से भी था बड़ा
और था बड़ा हज़ारों से
जीरो था लेश मात्र सा
कभी बड़ा ब्रह्माण्ड से
यूँ ही आराम आराम से
में उम्र के आयाम से
पर अभी ना जाने क्या होना होता normal
खुद से ही खुद की तारीफें
करनी है खुद से दरबदर
कहना है दिल में जो अगर
उठा कलम दहाड़ कर
ललकारकर
सम्हाल कर
तू बुराई पर प्रहार कर
जो है तो कोई टेढ़ा अगर
वो भी तो है मेरा मगर
कभी कही किसी मोड़ पर
टेढ़ा रास्ता आया अगर
टेढ़ा ही वहां पहुचायेगा
जिसको कहते है लोग शिखर
है जो तू बुद्धू
तो कुछ नई होता
बुद्धू होने से
कोई कुछ नई खोता
तू बुद्धू होगा
पर तू नासमझ नई है
अपनी समझ के बुलबुलों से
दुनिया को बेक़रार कर
उठा कलम दहाड़ कर
यलगार कर
तू सबसे प्यार कर
बेशुमार कर
इज़हार कर
उठा कलम दहाड़ कर
उठा कलम दहाड़ कर
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