टेढ़ा बुरा नहीं होता
मुझे सबसे बड़ी दिक्कत उस व्यक्ति से है जोअच्छी खासी टेढ़ी चीज़ को छील छील के सीधा करता है। फिर उसे अपने बनाये खांचे में ढालता है। अरे !! किसी की मूल्य प्रकर्ति को आप कबूल नहीं पा रहे है। आपके हिसाब से जो टेढ़ा है वो बुरा है । क्यों? इसीलिए आपके बनाये इंजन से आवाज़ आती है। वो तेल से चलता है और धुंआ फेकता है। तेल खत्म मशीने बंद। हमे टेढ़ी चीज़ को बुरा नहीं समझना चाहिए। किसी का टेढ़ा या सीधा होना ही उसकी ख़ास बात है।
में ऐसे अनगिनत लोगों को जानता हूं जिनकी काबिलियत को गलत आंका जाता है। हमारे काबिलियत को मापने वाले मापदंड सही नहीं है। हम कैसे किसी बच्चे को कमज़ोर कह सकते जबकि वो बहुत तेज़ भगता है या बहुत अच्छी पेंटिंग करता है। हमे लगता है के बच्चा पढाई में कमज़ोर है तो वो कमज़ोर है। यही नजरिया हमारा वस्तुओं को लेकर भी है। बहुत साल तो इंसान को यही समझने में लगे के नीले रंग की आग लाल रंग से ज़्यादा ज्वलनशील होती है।
हमे जब ज़मीन में पड़ा हुआ पेट्रोल मिला तब हमें समझ आया के इसको ईंधन की तरह इस्तेमाल कर सकते है। ईंधन पहले मिला इंजन उसकी तर्ज पे बनाया। मेरा सवाल है के इंजन रोटी से क्यों नहीं चलता या फिर चावल से? इंसान को धुप से भी कोई इंजन चलाने में सालो लग गए। गृतवाकर्षण से कोई मशीन चलने का भी काम बड़े सालों बाद भारत ने ही किया है।
मैं गडिंत के नियमो से भी परेशान हूं।मुझे रामानुजन का गडिंत साधा और सच्चा लगता है क्योकि उन्होंने एरर को अपनी गडिंत में कोई स्थान नहीं दिया है।
हो सकता है के मेरी बातें अजीब हो। मेरा मत कहता है के किसी भी व्यक्ति या वस्तू को उसके प्रतिभा के अनुसार ही इस्तेमाल करना चाहिए। एक ही इम्तेहान में सब नहीं बैठ सकते। लकड़ी अगर टेढ़ी है तो वो ज़रूर किसी टेढ़ी जगह पर काम आएगी। उसे घिसकर सीधा नहीं कर सकते वो टूट पड़ेगी अंदर और बाहर दोनों जगह से।
में ऐसे अनगिनत लोगों को जानता हूं जिनकी काबिलियत को गलत आंका जाता है। हमारे काबिलियत को मापने वाले मापदंड सही नहीं है। हम कैसे किसी बच्चे को कमज़ोर कह सकते जबकि वो बहुत तेज़ भगता है या बहुत अच्छी पेंटिंग करता है। हमे लगता है के बच्चा पढाई में कमज़ोर है तो वो कमज़ोर है। यही नजरिया हमारा वस्तुओं को लेकर भी है। बहुत साल तो इंसान को यही समझने में लगे के नीले रंग की आग लाल रंग से ज़्यादा ज्वलनशील होती है।
हमे जब ज़मीन में पड़ा हुआ पेट्रोल मिला तब हमें समझ आया के इसको ईंधन की तरह इस्तेमाल कर सकते है। ईंधन पहले मिला इंजन उसकी तर्ज पे बनाया। मेरा सवाल है के इंजन रोटी से क्यों नहीं चलता या फिर चावल से? इंसान को धुप से भी कोई इंजन चलाने में सालो लग गए। गृतवाकर्षण से कोई मशीन चलने का भी काम बड़े सालों बाद भारत ने ही किया है।
मैं गडिंत के नियमो से भी परेशान हूं।मुझे रामानुजन का गडिंत साधा और सच्चा लगता है क्योकि उन्होंने एरर को अपनी गडिंत में कोई स्थान नहीं दिया है।
हो सकता है के मेरी बातें अजीब हो। मेरा मत कहता है के किसी भी व्यक्ति या वस्तू को उसके प्रतिभा के अनुसार ही इस्तेमाल करना चाहिए। एक ही इम्तेहान में सब नहीं बैठ सकते। लकड़ी अगर टेढ़ी है तो वो ज़रूर किसी टेढ़ी जगह पर काम आएगी। उसे घिसकर सीधा नहीं कर सकते वो टूट पड़ेगी अंदर और बाहर दोनों जगह से।
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