कल की रात

हम पांच दोस्त थाने में खड़े थे घबराए और सहमे हुए | आज से पहले कभी हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ था | हमे दो पुलिस वाले पकड़ कर लाये थे | पता नहीं क्यों | दोनों पुलिस वाले हमे एक कमरे में ले गए | वो कमरा कांच का बना था अंदर कोई बड़े साहिब बैठे थे | उन्हें देख कर लगा के वो गुस्से में है | दो छोटे पुलिस वाले बड़े पुलिस वाले के सामने कुर्सी पर बैठ गए और बोले, " यही है वो लोग | " मुझे समझ नहीं आया कौन है हम लोग | हो सकता है क हम उग्रवादी या आतंकवादी हो | या फिर हो सकता है हम ISI एजेंट हो | मुझे समझ नहीं आ आ रहा था के के ये पुलिस वाले हमे  क्या समझ रहे हैं ? क्योंकि हम कुछ नहीं थे तो हम कुछ भी हो सकते थे | जैसे कोई नया पैदा हुआ बच्चा | जब तक के उसका कोई नाम न रख दो सब उसे अपने मन से कुछ भी बुलाते हैं | मेरी अलावा बाकि के चार दोस्त जादा घबराये थे | उनके गले सूखे हुए थे | आँखे पलकों साथ नहीं दे रही थी |

 इतने में मैने कुछ पुराना देखा | दो छोटे पुलिस वाले एक बड़े पुलिस वाले को अपनी उपलब्धि बता रहे थे," हमने रस्ते एम एक गाय पकड् के ले रहे बच्चे को भी पकड़ लिया |" ख़ुशी से बड़े पुलिस वाले ने कहा, " अरे वेरी गुड |" असल में जब वो दोनों पुलिस वाले हमे पकड़ के थाने ले जा रहे थे तो रस्ते में अचानक उन्हें कोई आदमी एक बच्चे के साथ गाय को ले जाते हुए दिखा | पुलिस वाले ने गाड़ी रोकी | हमारी गाड़ी में भी एक पुलिस वाला था तो हमने भी गाड़ी रोकी | दो गाड़िया रुकी तो गाय चुराने वाला चोर भाग खड़ा हुआ | उसके साथ जो बच्चा था वो भी भगा | इतना कुछ हुआ तो गाय को समझ आया के उसकी जान भी खतरे में हैं तो वो भी भागी | पुलिस वालो के हाथ आया सिर्फ बच्चा | गाय और उसका चोर भाग गए | इस वाक्यात को दोनों छोटे पुलिस वाले बड़े पुलिस वाले को ऐसे बता रहे थे जैसे के उन्होंने तो गौ हत्या का समाधान ही निकाल दिया हो| ठीक वैसे ही जैसे मेरे पुराने ऑफिस में लोग मालिक को अपनी बेकार की और बेमतलब की वाहियात कोशिशो को माखन लगा लगा कर बताते थे और मालिक भी बिना सींचे समझे कहता था "अरे वेरी गुड"|

 अब बारी आई हमारी | हमे नहीं पता था के हमारा जुर्म क्या हैं | बड़े साहिब ने हम पांच लोगों में से एक कमज़ोर और घबराए हुए से पुछा के कौन हैं तू ? फ़िरोज़ भाई ने कहां 'फ़िरोज़'| "क्या कर रहे थे वहां?" "खड़े थे | "   मैने बीच में टोकते हुए कहा के सर हमने कोई गलत काम नहीं किया हैं, अगर गलती मानी भी जाये तो इतनी हैं के घर से कुछ दूर हम रात में खड़े थे | बड़े साहिब ने आगे न कुछ सुना न समझा और कह दिया के इनकी गाड़ी सील कर दो | हम पांचो घबरा गए | अभी तो हमारा जुर्म भी नहीं पता था हमे और सजा भी सुना दी गयी | हम सबने सॉरी सॉरी करना शुरू कर दिया | बड़े साहिब तो और गुस्से में आ गए और डांट के बाहर निकाल दिया |

कुछ देर बाद मै सोच समझ के उस कांच के कमरे के बाहर जाकर खड़ा हो गया | घबराते हुए मैने दरवाज़ा खटखटाया | बड़े साहिब ने अनदेखा किया तो मै अंदर ही चला गया | में सोच के गया था के पैसे तो मै नहीं दूंगा | सील भी नहीं होने दूंगा | अपने बारे मै बताऊंगा तो शायद वो समझ जाये के मै और मेरे दोस्त कोई गलत लोग नहीं हैं | मैने अंदर जाते ही कहा के सर मै एक टीचर हू बच्चो को पढता हू और वो भी पत्रकारिता के बच्चो को | मैने और मेरे दोस्तों ने कुछ नहीं किया हैं आप हमे जाने दो | बड़े साहिब जो के पहले से ही गुस्से मे थे और जादा भड़क गए | " मैने तुझ से कहा के बाहर निकल फिर  भी तू अंदर आ गया जुर्म करने वाला कभी नहीं कहता उसने क्या किया हैं | बहार जा दरोगा तो गाड़ी के कागज़ और लिसेन्स दिखा | फिर आ | " मैने कहा के, जब आपके लोग मुझे ला रहे थे तो मैने पुछा था के लिसेन्स ले लू पर वो बोले नहीं चलो अब कहां से लाउ लाइसेंस | साहिब बोले के घर से मंगवा अभी | में बाहिर आ गया अपना गुस्सा भी साथ ले आया |

मै खड़ा रहा अपने दोस्तों के साथ | मैने देखा के एक औरत जिसका बच्चा छीन लिया हैं किसीने वहां खड़ी हैं | न्याय के लिए | वो गाय चुराने वाला बच्चा भी था | मुस्तफा भी देख रहा था उसे | मुस्तफा ने कहा के गाय तो अब तक दुबारा पकड़ ली गयी होगी | अलीम भाई ने कहां हाँ | इज़हार भाई ने कहा, " हम अपने ही घर के सामने खड़े थे, पुलिस आई और ले गयी और हम साबित नहीं कर पा रहे हैं के हमने कुछ गलत नहीं किया, क्यों?


हम खड़े रहे | मै बार बार जाकर छोटे पुलिस वालो से बिनती करता रहा के हमे जाने दो | मेरी दोस्त इंतज़ार करते रहे के कब ये सिलसिला खत्म हो | बड़े साहिब गाड़ी मे बैठ कर चले गए, कांच के कमरे को अकेला छोड़ कर | वो औरत जिसका बच्चा छीन लिया था, चार पुलिस वालो के साथ गाड़ी मे बैठ कर चली गयी | बचा वो बच्चा जिसने गाय चुराई थी और हम | हमने देखा के कोई हमे देख नहीं रहा | में गाड़ी मे बैठा और हम चले आये | इतना सब कुछ हुआ मैने और मेरे दोस्तों ने एक बार भी गुस्सा नहीं दिखाया |   आज घर के पास से ले गए कल सुबह सुबह  दाँत मझते हुए ले जायेंगे , परसो खाना खाते हुए ले जायेंगे | हमने अगर कुछ कहा तो कहेंगे के हम असहिरुणता दिखा रहे हैं | ये लोग असल मे किसी धर्म के नहीं हैं | होते तो उस गाय को बचा लेते | ये बस दरिंदे हैं | जो किसी भी तरह से बिना कुछ काम किये आराम की रोटी तोडना चाहते हैं | मैने उस कांच के कमरे कोई कई बार कई जगह देखा हैं | नाम बदले हैं लोग वही हैं | बेरहम, नासमझ और बेशरम |

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